रामचरितमानस का अनुवाद दि रामायण ऑफ़ तुलसीदास में कहावतें एवं मुहावरें के अनुवाद की समस्याएं

K Jayalakshmi

Abstract


मनुष्य एक है पर भौगोलिक, सामजिक, और भाषिक सीमाओ के कारण वे अलग हैं। इसमें भाषा की सीमा सब से प्रमुख है । मानव मन इन सीमाओं को लांघकर विश्व भर में व्यापने केलिए तड़पता रहता है । और इस सीमा को लांघना का सबसे बड़ा माध्यम अनुवाद है । अनुवाद वह सेतु है जो भिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों, परिवेशों एवं भाषाओं की सौंदर्य चेतना को परिचित बना देता है। रामायण हमारे देश का महाकाव्य है जिसने समस्त भारत को एक सूत्र में बाँध दिया है । अपने काव्य सौंदर्य  से इसका महत्त्व मात्र भारत तक ही सीमित नहीं विश्व भर में भी व्याप्त हुआ है । जब दो भाषाएं एक ही परिवार की नहीं होती है तो अनुवाद करने में अनुवादक को कठिनाई होती है । भाषा की सौंदर्य मुहावरे और कहावत प्रधान करती हैं । इसी पर प्रस्तुत लेख है जहाँअनुवादक के समक्ष इनके अनुवाद की कठिनाई को प्रस्तुत किया है । अगर अनुवादक इन शब्दों के अर्थ और उससे जुड़े सांस्कृतिक तथ्यों को बिना समझे अनुवाद करेगा तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है और कभी वह मात्र शब्दों का ढ़ेर बन जाएगा ।


Keywords


अनुवाद,मानस, कहावत,मुहावरे

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References


रामचरितमानस , गीता प्रेस, गोरखपुर सं 2000

The Ramayana of Tulsidas (Vol.I& II) , Rev; A.G.Atkins, Hindustan Times Press, Delhi 1954

मानस पीयूष श्री अन्जनीनंदन शरण गीता प्रेस, गोरखपुर संवत 2017

राजस्थानी कहावतें एक अध्ययन,कन्हैयालाल सहल, भारतीय साहित्य मंदिर, दिल्ली , 1958

भाषा विज्ञान भोलानाथ तिवारी किताब महल इलाहाबाद


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